जैविक खेती के फायदे और नुकसान

जैविक खेती से आम जनता और पशुओं को जहर मुक्त भोजन और चारा देकर स्वास्थ्य की गम्भीर बीमारियों पर नियन्त्रण किया जा सकता है

क्या 100% जैविक खेती से देश में आ सकता है श्रीलंका जैसा खाद्यान्न संकट? (जैविक खेती के फायदे और नुकसान)

​आजकल हर जगह जैविक खेती (Organic Farming) की चर्चा है। कहा जाता है कि रासायनिक खादों को पूरी तरह से बंद कर देना चाहिए। लेकिन क्या रातों-रात 100% जैविक खेती अपनाना सुरक्षित है? अगर हम पड़ोसी देश श्रीलंका का उदाहरण देखें, तो वहाँ सरकार ने अचानक रासायनिक खेती पर बैन लगाकर पूरी तरह जैविक खेती अपनाने का फैसला किया था। नतीजा यह हुआ कि वहाँ पैदावार इतनी गिर गई कि देश में भयंकर खाद्यान्न संकट (Food Crisis) आ गया और अर्थव्यवस्था चरमरा गई।

जैविक खेती या परम्परागत खेती से उत्पादकता में बहुत कमी और अधिक लागत के कारण देश में खाद्यान्न संकट पैदा होने की प्रबल सम्भावना है जैसे पड़ौसी देश श्रीलंका में अनाज संकट आना जैविक खेती अपनाने का कारण है

​ऐसे में सवाल उठता है कि 140 करोड़ से ज्यादा आबादी वाले हमारे देश में, जहाँ करोड़ों लोगों का पेट भरना एक बड़ी चुनौती है, क्या सिर्फ जैविक खेती के भरोसे रहा जा सकता है? आइए जैविक खेती के फायदे और नुकसान का गहराई से विश्लेषण करते हैं।

जैविक खेती के फायदे (क्यों है यह जरूरी?)

​रसायनों के अंधाधुंध इस्तेमाल ने खेतों और हमारी सेहत, दोनों को नुकसान पहुँचाया है। इसलिए जैविक खेती के कुछ फायदे बहुत महत्वपूर्ण हैं:

जैविक खेती और रासायनिक खेती को एक साथ करना भी चुनौती पूर्ण है कम पैदावार और भूमि का कमजोर होने अधिक लागत मुख्य कारण है

मिट्टी की सेहत में सुधार: जैविक खादों (गोबर, केंचुआ खाद) के उपयोग से मिट्टी में जीवाश्म (Organic Carbon) बढ़ता है, जिससे जमीन बंजर होने से बचती है।

 ​जहर मुक्त भोजन: रसायनों के बिना उगाई गई फसलें स्वास्थ्य के लिए बेहतर होती हैं और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा कम करती हैं।

​पर्यावरण की सुरक्षा: कीटनाशकों का उपयोग न होने से  मित्र कीट (जैसे केंचुए), पानी और हवा प्रदूषित होने से बचते हैं।

​जैविक खेती की कड़वी सच्चाई (नुकसान और चुनौतियां)

​सिर्फ फायदों को देखकर अगर हम अचानक पूरी तरह जैविक खेती पर चले जाएं, तो इसके परिणाम बेहद खतरनाक हो सकते हैं:

​उत्पादन में भारी गिरावट: यह सबसे बड़ी कड़वी सच्चाई है कि जब कोई किसान रासायनिक खाद छोड़कर अचानक जैविक अपनाता है, तो शुरुआती 3 से 5 सालों तक फसल का उत्पादन न के बराबर रह जाता है।

​राष्ट्रीय खाद्यान्न संकट का डर: अगर देश के सभी किसान एक साथ जैविक खेती करने लगें और पैदावार आधी रह जाए, तो श्रीलंका की तरह हमारे यहाँ भी अनाज की भारी कमी हो जाएगी।

​महंगी खेती और कीटों का हमला: जैविक तरीके से खेती करना और प्राकृतिक कीटनाशक तैयार करना कई बार ज्यादा श्रम और लागत मांगता है। अचानक रासायनिक दवाइयां बंद करने से पूरी की पूरी फसल कीटों के हमले से बर्बाद हो सकती है।

​बीच का रास्ता: संतुलित खेती (Integrated Farming)

​खेती में सिर्फ जैविक या सिर्फ रासायनिक का हठ करना सही नहीं है। आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है— संतुलित खेती (Integrated Nutrient Management)। इसका मतलब है दोनों तरीकों का समझदारी से तालमेल बिठाना:

​रसायनों का अंधाधुंध प्रयोग रोकें: यूरिया और डीएपी (DAP) का इस्तेमाल एकदम बंद न करें, बल्कि मिट्टी की जांच कराकर केवल उतनी ही मात्रा डालें जितनी फसल को जरूरत है

रासायनिक दवाईयों का प्रयोग करते समय समय सीमा का ध्यान रखा जाये तो फसल में जहर का असर नहीं होता है जैसे किसी रासायनिक दवाई का समय 45 दिन तक का है तो उसको तीन महिने से पकने वाली फसल में उपयोग करे और सब्जी वाली फसल मे 2 या 3 दिन तक असर वाली दवाईया का उचित मात्रा में उपयोग करने से फसल में कोई प्रभाव नहीं होता है।

​जैविक खादों का उपयोग बढ़ाएं: रासायनिक खादों के साथ-साथ खेतों में गोबर की खाद, वर्मी कंपोस्ट और हरी खाद का उपयोग करें। इससे मिट्टी की ताकत बनी रहेगी और रासायनिक खाद कम डालनी पड़ेगी।

​धीरे-धीरे बदलाव करें: अगर कोई किसान पूरी तरह जैविक खेती करना भी चाहता है, तो उसे एक साथ पूरे खेत में ऐसा नहीं करना चाहिए। पहले एक छोटे हिस्से (जैसे 1 या 2 बीघा) में इसकी शुरुआत करनी चाहिए।

​यह सच है कि जैविक खेती पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए बेहतरीन है, लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सच है कि 100% जैविक खेती से देश का पेट नहीं भरा जा सकता। देश को खाद्यान्न संकट से बचाने और अपनी जमीन को बंजर होने से रोकने के लिए हमें रासायनिक और जैविक, दोनों तरीकों को मिलाकर चलना होगा। एक जागरूक किसान वही है जो समय की मांग के अनुसार संतुलित रास्ता चुने।

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