
मृदा परीक्षण से कम खर्च में 100%पैदावार लेना हुआ आसान
मृदा परीक्षण / जांच का महत्व
उर्वरक संबंधी आवश्यकताओं के बारे में प्रबंधन संबंधी निर्णय लेने के लिए मृदा जांच इसका आधार है। इसमें मृदा सैम्पल में उपलब्ध पोषक तत्वों और अम्लीय अभिक्रिया का प्राकलन और मूल्यांकन करना शामिल है। जांच के पश्चात् उर्वरता मैप तैयार किया जाता है जिसमें उपलब्ध नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटेशियम को कम, मध्यम अथवा अधिक चिन्हित किया जाता है। पर्याप्त और अपर्याप्त पोषक तत्वों को चिन्हित किया जाता है और पोषण संबंधी आवश्यकताओं को निर्धारित किया जाता है। उर्वरक मिलाने से जो कि मृदा जांच पर आधारित है, से सामान्यतया आवश्यक पोषक तत्वों की सही मात्रा प्रदान कर उत्पादन और लाभ में वृद्धि करते हैं। इससे पोषक तत्व समान रूप से पूरे खेत को समान रूप से मिल जाते हैं। नियमित मृदा जांच से पर्यावरणीय निर्वाह्यता में भी सहायता मिलती है क्योंकि अत्यधिक उर्वरकों के उपयोग से बचा जा सकता है।
खेती में अनवरत अपेक्षित उत्पादकता बनाए रखने हेतु मृदा का स्वस्थ होना आवश्यक है। इसके लिये कृषकों को नियमित अन्तराल में अपने खेतों का मृदा परीक्षण अवश्य कराते रहना चाहिए। यदि किसान व्यक्तिगत स्तर पर अपने खेत की मृदा के स्वास्थ्य की जाँच कराना चाहते हैं, तो मृदा नमूने हमेशा रबी या खरीफ फसलों की कटाई उपरान्त लेना चाहिए। मिट्टी का नमूना लेकर अपने नजदीकी कृषि विश्वविद्यालय, कृषि अनुसन्धान केन्द्रों, कृषि विज्ञान केन्द्रों, कृषकों व इफको इत्यादि के मृदा परीक्षण केन्द्रों में भेजा जा सकता है।

मृदा परीक्षण की आवश्यकता क्यों?
मृदा पोषक तत्वों का भंडार है तथा पौधों को अपना जीवन चक्र पूरा करने के लिए 17 पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। ये तत्व हैं: कार्बन, हाइड्रोजन, आक्सीजन, नत्रजन, फास्फोरस, पोटाश, कैल्सियम, मैग्नीशियम, सल्फर, जस्ता, मैग्नीज, ताँबा, लौह, बोरोन, मोलिब्डेनम, क्लोरीन व निकिल। इन सभी तत्वों का संतुलित मात्रा में प्रयोग करने से ही उपयुक्त पैदावार ली जा सकती है। लगातार फसल उत्पादन में वृद्धि एवं बढ़ती सघन खेती के परिणामस्वरूप पोषक तत्वों का ह्रास भी बढ़ रहा है। परंतु उर्वरकों एवं रासायनिक खादों द्वारा उनकी पूर्ति पूरी तरह से नहीं हो पा रही है जिससे भूमि की उर्वरा शक्ति क्षीण होती जा रही है। फसलों से अधिक उपज लेने के लिये यह जानना आवश्यक हो जाता है कि मृदा में कौन-कौन से पोषक तत्व कितनी मात्रा में उपलब्ध हैं।
मृदा परीक्षण के उद्देश्य
1.मृदा में सुलभ पोषक तत्वों की सही मात्रा ज्ञात करना।
2.परीक्षण के आधार पर फसल के लिए आवश्यकतानुसार उर्वरकों की सही मात्रा का निर्धारण करना।
3.उत्पादन प्राप्त करने एवं उर्वरकों की उपयोग क्षमता में वृद्धि के लिये।
4.मृदा के अनुसार विभिन्न क्षेत्रों के लिए मिट्टी उर्वरता का मानचित्र तैयार करना। इस प्रकार की सूचना प्रदान कर उर्वरक निर्माण, वितरण एवं उपयोग में सहायता करना।
5.मृदा में लवणता, क्षारीयता तथा अम्लीयता की समस्या की पहचान व जांच के आधार पर भूमि सुधारकों की मात्रा व प्रकार की सिफारिश कर भूमि को फिर से कृषि योग्य बनाने में योगदान करना।
6.फलों के बाग लगाने के लिए भूमि की उपयुक्तता का पता लगाना।
मृदा परीक्षण के लाभ
1.मृदा परीक्षण से जैविक कार्बन, सुलभ पोषक तत्वों की मात्रा, मिट्टी का पीएच मान, घुलनशील लवण या विद्युत चालकता का पता चलता है।
2.खाद तथा उर्वरकों का संतुलित प्रयोग किया जा सकता है जिससे उत्तम उपज के साथ खाद एवं उर्वरकों के प्रयोग पर उचित व्यय का निर्धारण किया जा सकता है।
3.खादों तथा उर्वरकों के संतुलित प्रयोग से भूमिगत जल प्रदूषण से बचाव होता है।
4.मृदा परीक्षण में उर्वरकों के साथ-साथ गोबर या कम्पोस्ट खाद की भी संस्तुति की जाती है जिससे उर्वरकों की क्षमता में भी वृद्धि होती है।
4.समस्याग्रस्त मिट्टियाँ जैसे अम्लीय या क्षारीय के लिए चूना तथा जिप्सम की सही मात्रा का निर्धारण भी मृदा परीक्षण द्वारा ही होता हैं।
मृदा का नमूना लेने की विधि
1.यदि खेत समतल हो तथा पूरे खेत में एक फसल उगाई गई हो और खाद एवं उर्वरक समान मात्रा में डाले गये हों तो खेत से एक ही संयुक्त नमूना लिया जा सकता है।
2.जिस जमीन का नमूना लेना हो उस क्षेत्र पर 10-15 जगहों पर निशान लगा लें।
3.चुनी गई जगह की ऊपरी सतह पर यदि कूड़ा करकट या घास इत्यादि हो तो उसे हटा दें।
4.खुरपी या फावड़े से 15 सेमी गहरा गड्ढा बनाएं। इसके एक तरफ से 2-3 सेमी मोटी परत ऊपर से नीचे तक उतार कर साफ बाल्टी या ट्रे में डाल दें। इसी प्रकार शेष चुनी गई 10-15 जगहों से भी उप नमूने इकट्ठा कर लें।
5.अब पूरी मृदा को अच्छी तरह हाथ से मिला लें तथा साफ कपड़े या टब में डालकर ढेर बनालें। अंगुली से इस ढेर को चार बराबर भागों में बांट दें। आमने सामने के दो बराबर भागों को वापस अच्छी तरह से मिला लें। यह प्रक्रिया तब तक दोहराएं जब तक लगभग आधा किलो मृदा न रह जाए। इस प्रकार से एकत्र किया गया नमूना पूरे क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करेगा।
6.नमूने को साफ प्लास्टिक की थैली में डाल दें। अगर मृदा गीली हो तो इसे छाया में सूखा लें। इस नमूने के साथ नमूना सूचना पत्र जिसमें किसान का नाम व पूरा पता, खेत की पहचान, नमूना लेने की तिथि, जमीन का ढलान, सिंचाई का उपलब्ध स्रोत, आगे ली जाने वाली फसल का नाम, पिछले तीन साल की फसलों का ब्यौरा व कोई अन्य समस्या आदि का विवरण, कपड़े की थैली में रखकर इसका मुँह बांधकर कृषि विकास प्रयोगशाला में परीक्षण हेतु भेज देवें।

7.फल उत्पादन हेतु मिट्टी परीक्षण के लिए नमूना लेने की विधि अलग है। इसमें कम से कम 4-5 स्थानों पर 3 फुट गहरा गड्ढा बनायें। गड्ढे की एक तरफ की दीवार से एक-एक फुट गहराई के तीन अलग-अलग नमूने बनाएं (0-30), 30-60 तथा 60-90 सेंटीमीटर)। प्रत्येक गड्ढे की मिट्टी को उसकी उसी गहराई के अनुसार एक साथ अच्छी तरह मिला लें। इस प्रकार पूरे खेत से तीन नमूने तैयार करें। यदि मिट्टी का नमूना पहले से स्थापित बगीचे से लेना हो तो तौलियों के बीच से तीन चार जगह से मिट्टी लेकर मिला लेना चाहिए।
8.ऊसर भूमि से मिट्टी का नमूना 100 सेमी. गहराई तक लेना चाहिए। नमूना लेने के लिए भूमि की सतह पर लवण की पपड़ी को खुरच कर अलग नमूने के तौर पर रख लें। फिर 0-15, 15-30, 30-60 और 60-100 सेमी. गहराई से अलग-अलग चार नमूने ले लें।
नमूना लेने के लिए आवश्यक सामग्री
खुरपी, फावड़ा, लकड़ी या प्लास्टिक की खुरचनी
ट्रे या प्लास्टिक की थैली।
पेन, धागा, मृदा का नमूना, सूचना पत्र

मृदा परीक्षण के लिए नमूना लेने का समय
मिट्टी की जाँच फसल की बुआई पूर्व या बगीचा लगाने के 5-6 महीने पूर्व करवानी चाहिए ताकि मृदा सुधारकों का आवश्यकतानुसार प्रयोग किया जा सके। फलदार बगीचे से मिट्टी का नमूना फल तोड़ने के बाद तथा खाद एवं उर्वरक डालने से पूर्व लेना चाहिए। बरसात में मिट्टी का नमूना नहीं लेना चाहिए। बगीचों के उचित रख रखाव के लिए कम से कम तीन वर्ष में एक बार मिट्टी परीक्षण आवश्यक होता है।
नमूना की गहराई
खाद्यान्न फसलों, सब्जियों, चारे, दलहन व तिलहन जैसी फसलों के लिए ऊपरी सतह (9-15 सेंटीमीटर) तथा बहुवर्षीय वृक्षों जैसे फल-वृक्ष आदि के लिए ऊपरी सतह के साथ निचली सतह (15-30 सेंटीमीटर) गहरी परतों से भी अलग-अलग नमूना लेना चाहिये। फलोद्यान में वृक्षों की जड़ें अधिक गहराई तक जाती हैं इसलिए विभिन्न गहराई की मिट्टी का परीक्षण आवश्यक होता है।
सावधानियां
1.जिस खेत मे कंपोस्ट, खाद, चूना, जिप्सम तथा अन्य कोई भूमि सुधारक तत्काल डाला गया हो तो उस खेत से नमूना न लें।
2.नमूना किसी भी दशा में राख, दवाई, रासायनिक खाद या प्रयोग में लाये गये थैलों, डिब्बों अथवा ट्रैक्टर के बैटरी इत्यादि के सम्पर्क में नहीं आना चाहिए।
3.नमूना उस खेत का सच्चा प्रतिनिधि होना चाहिए। रंग, ढाल, फसलोत्पादन आदि गुणों की दृष्टि से असमान खेतों से अलग-अलग नमूना लेना चाहिये।
4.मृदा का नमूना खाद के ढेर, पेडों, मेड़ों, ढलानों व रास्तों के पास से तथा ऐसी जगहों से जो खेत का प्रतिनिधित्व नहीं करती है न लें।
5.एक नमूना ज्यादा से ज्यादा दो हैक्टेयर से लिया जा सकता है।
6.मृदा का नमूना बुआई से लगभग एक माह पूर्व कृषि विज्ञान प्रयोगशाला में भेज दें जिससे समय पर मृदा की जांच रिपोर्ट मिल जाएं एवं उसके अनुसार उर्वरक एवं सुधारकों का उपयोग किया जा सके।
7.यदि खड़ी फसल में पोषक तत्वों की कमी के लक्षण दिखाई दें और मृदा का नमूना लेना हो तो फसल की कतारों के बीच से नमूना लेना चाहिए।
8.मृदा के नमूने के साथ सूचना पत्र अवश्य डालें जिस पर साफ अक्षरों में नमूना संबंधित सूचना एवं किसान का पूरा पता लिखा हो।
9. सूक्ष्म तत्वों की जांच के लिए नमूना लेते समय धातु से बने औजारों या बर्तनों को काम में नहीं लाएं क्योंकि इनमें लौह, जस्ता व तांबा होता है। जहां तक संभव हो, प्लास्टिक या लकड़ी के औजार काम में लें।
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सॉयल हेल्थ कार्ड – स्वस्थ धरा, खेत हरा- हरा
