शुष्क क्षेत्रों में पैदावार बढ़ाने की तकनीकें

आइए जानते हैं “शुष्क क्षेत्रों में 100 % पैदावार बढ़ाने की 5 तकनीकें”

आज के समय में गिरता भू-जल स्तर और कम बारिश किसानों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुके हैं। खासकर उन क्षेत्रों में जहाँ वर्षा बहुत कम होती है (शुष्क क्षेत्र), वहाँ खेती करना एक जुआ जैसा हो गया है।

आधुनिक कृषि तकनीकें और विज्ञान कहता है कि अगर हम वर्षा जल प्रबंधन (Rainwater Management) को सही से समझ लें, तो कम पानी में भी बेहतरीन और मुनाफेदार फसल ली जा सकती है।​आइए जानते हैं उन 5 वैज्ञानिक तकनीकें के बारे में, जिन्हें अपनाकर आप अपने खेत की नमी बढ़ा सकते हैं और फसल की पैदावार को दोगुना कर सकते हैं।​

1. ढलान के विपरीत कृषि (Contour Farming)​अक्सर किसान भाई ढलान की दिशा में ही जुताई और बुवाई कर देते हैं, जिससे बारिश का पानी तेजी से बहकर खेत से बाहर निकल जाता है। इसके विपरीत, हमेशा खेत की ढलान के आड़े (विपरीत दिशा में) जुताई और बुवाई करनी चाहिए।​फायदा: इससे हर कतार (Row) एक छोटे बांध की तरह काम करती है। पानी बहने के बजाय कूंड़ में ही रुक जाता है और धीरे-धीरे जमीन के अंदर समा जाता है। यह नमी फसल को लंबे समय तक हरा-भरा रखती है।

2. मेड़बंदी और वाटर हार्वेस्टिंग (Bunding & Water Harvesting)​खेत से पानी और उपजाऊ मिट्टी को बाहर बहने से रोकने के लिए मेड़बंदी सबसे आसान और असरदार तरीका है।​यदि आपका खेत अधिक ढलान वाला है, तो थोड़ी-थोड़ी दूरी पर मजबूत मेड़ बनाएं।​खेत के सबसे निचले हिस्से में एक छोटा कृषि तालाब (Farm Pond) या टैंक जरूर बनाएं। बारिश का जो पानी बच जाता है, वह खेत तालाब (फार्म पौंड ) में इकट्ठा हो जाएगा। इस पानी का उपयोग आप तब कर सकते हैं जब फसल को पानी की सबसे ज्यादा जरूरत हो।

शुष्क खेती की मुख्य तकनीकें  में खेत तलाई बहुत लाभदायक है वर्षा पानी संग्रहण कर खेती से किसान की आमदनी बढ़ाने का सही तरीका है

​3. पट्टीदार खेती का फॉर्मूला (Strip Cropping)​यह सूखी खेती के लिए एक जादुई तकनीक है। इसमें आपको पूरे खेत में एक ही फसल लगाने के बजाय पट्टियों (Strips) में फसल लगानी होती है।​कैसे करें: ऊंचे कद की फसलों (जैसे बाजरा, ज्वार या मक्का) की कुछ कतारों के बाद, कम ऊंचाई वाली और जमीन पर फैलने वाली फसलें (जैसे मूंग, उड़द, मूंगफली या सोयाबीन) लगाएं।​वैज्ञानिक कारण: ये दलहनी फसलें जमीन को पूरी तरह ढक लेती हैं, जिससे पानी का बहाव धीमा हो जाता है, मिट्टी का कटाव रुकता है और साथ ही ये फसलें जमीन में नाइट्रोजन बढ़ाकर उसे अधिक उपजाऊ बनाती हैं।

​4. पुराने कुओं को रीचार्ज करना (Well Recharging)​ज्यादातर क्षेत्रों में कुएं सूख रहे हैं या उनका जलस्तर बहुत नीचे चला गया है। बारिश के मौसम में जो पानी खेत से बेकार बहकर बाहर जा रहा है, उसे फिल्टर करके अपने कुएं में डाइवर्ट करें। इस रीचार्जिंग तकनीक से आपके कुएं का वॉटर लेवल सुधरेगा और आने वाले सीजन में आपको सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी मिल सकेगा।​

5. आधुनिक भूमि सुधार और समतलीकरण​खेत का उबड़-खाबड़ होना पानी की बर्बादी का बड़ा कारण है। लेजर लैंड लेवलर की मदद से खेत को समतल करवाएं। इसके अलावा, खेत के किनारों पर और खाली पड़ी जमीनों पर वृक्षारोपण करें, जिससे हवा के वेग से होने वाला .वाष्पीकरण (Evaporation) कम हो और मिट्टी की नमी सुरक्षित रहे। ढ़लान वाले क्षेत्रों में जल अधिग्रहण क्षेत्र का विकास करना, जिससे मृदा में वर्षा का पानी संचय करने तथा भू-जल स्तर बढ़ाने में भी मदद मिलेगी l

मिट्टी की नमी सुरक्षित रहे।मिट्टी की नमी को उड़ने से कैसे रोकें? (Soil Moisture Conservation)​पानी रोकने के बाद सबसे बड़ी चुनौती होती है मिट्टी की नमी को तेज धूप और हवा से बचाना। इसके लिए 5 तकनीकें अपनाएं:​

1.वैज्ञानिक खरपतवार नियंत्रण (Weed Management) तकनीकें ​खेत में उगने वाले अनावश्यक खरपतवार मिट्टी की नमी को सोखकर हवा में उड़ा देते हैं (वाष्पोत्सर्जन)। इसलिए बारानी खेती में समय पर निराई-गुड़ाई करके खरपतवारों को पूरी तरह नष्ट करना बेहद जरूरी है, ताकि मुख्य फसल को पूरा पोषण और पानी मिल सके।

  • ​मिट्टी की ऊपरी परत तोड़ना: जमीन से पानी को भाप बनकर उड़ने से रोकने के लिए ‘कुल्फा’ या ‘बख्खर’ चलाकर मिट्टी की ऊपरी सतह को हल्का सा तोड़ दें। यह सूखी हुई ऊपरी परत नीचे की नमी के लिए एक सुरक्षा कवच का काम करती है।
  • ​पलवार (Mulch) का उपयोग: कतारों के बीच की खाली जमीन को सूखी घास, फसल के अवशेषों या मल्चिंग फिल्म से ढक दें, जिससे वाष्पीकरण (Evaporation) न्यूनतम हो जाता है।
  • ​3. पोषक तत्व और ऑर्गेनिक खाद का जादू मिट्टी की पानी रोकने की क्षमता (Water Holding Capacity) बढ़ाने के लिए प्रति हेक्टेयर 5 से 10 टन गोबर की अच्छी सड़ी हुई खाद, या 5 से 8 टन कंपोस्ट, या 3 से 6 टन केंचुए की खाद (वर्मीकंपोस्ट) का इस्तेमाल करें। यह मिट्टी को स्पंज जैसा बना देती है जो लंबे समय तक पानी को पकड़कर रखता है।
  • ​4. पौधों की संख्या का सही प्रबंधन​अगर खेत में पौधे बहुत ज्यादा घने होंगे, तो वे जमीन की पूरी नमी को जल्दी खींच लेंगे। इसलिए शुष्क क्षेत्रों में उचित दूरी पर ही बुवाई करें। यदि पौधे ज्यादा घने हो गए हों, तो कुछ कमजोर पौधों को बीच से उखाड़कर (Thinning) संख्या को सीमित कर दें। पत्तियों को मुरझाने से बचाने के लिए 0.5% पोटेशियम का पर्णीय छिड़काव (Foliar Spray) भी एक कारगर उपाय है।
  • ​5. आधुनिक तकनीकें: हाइड्रोजेल और वाष्पोत्सर्जन रोधी रसायन ​हाइड्रोजेल (Hydrogel): बुवाई के समय प्रति हेक्टेयर 2.5 से 5.0 किलोग्राम पॉलीमर (जैसे हाइड्रोजेल) का उपयोग करें। यह पाउडर पानी को सोखकर जेल बन जाता है और सूखा पड़ने पर पौधों की जड़ों को पानी देता रहता है। ​एंटी-ट्रांसपिरेंट स्प्रे: फसल की खास अवस्थाओं में केओलिन (6 प्रतिशत) या साइकोसेल (0.03 प्रतिशत) जैसी दवाओं का छिड़काव करने से पत्तियों से होने वाला पानी का नुकसान काफी कम हो जाता है।

कम बारिश और पानी की कमी वाले क्षेत्रों में खेती करना हमेशा से एक चुनौती रहा है। लेकिन अगर किसान भाई कुछ वैज्ञानिक और उन्नत तकनीकों को अपनाएं, तो वे न केवल पानी की बचत कर सकते हैं, बल्कि अपनी पैदावार और मुनाफे को भी कई गुना बढ़ा सकते हैं। आइए जानते हैं इन खास तकनीकों के बारे में:

​1. मिट्टी की नमी का स्मार्ट और समझदारी से उपयोग बारानी इलाकों में मिट्टी की नमी को बचाकर रखना सबसे जरूरी है। इसके लिए कुछ खास तकनीकें अपनाए जा सकते हैं:

2.​सही किस्मों का चुनाव: हमेशा ऐसी फसलों और बीजों का चयन करें जो कम पानी और सूखे को सहन करने की क्षमता रखते हों।

​3.बुवाई का सही तरीका: सही समय और उचित गहराई पर बीज बोना बहुत जरूरी है। उत्तर-पश्चिमी भारत में रबी की फसल के समय अगर नमी कम हो, तो ‘एक्वा फर्टि सीड ड्रिल’ (Aqua ferti seed drill) की मदद से पानी के साथ बुवाई (लगभग 15,000 से 20,000 लीटर प्रति हेक्टेयर) करने से बीजों का अंकुरण बहुत शानदार होता है। ​

4.बीजोपचार: बुवाई से पहले बीजों को पानी या पोटेशियम नाइट्रेट से उपचारित करने से उनका जमाव अच्छा होता है।

5.पोषक तत्वों का छिड़काव: खड़ी फसल में 1-2% यूरिया या 0.1% थायो-यूरिया का छिड़काव करने से फसल को सूखे से लड़ने की ताकत मिलती है।

मृदा तकनीकें

​असिंचित क्षेत्रों की मिट्टी को केवल पानी की ही नहीं, बल्कि खुराक (पोषक तत्वों) की भी भारी जरूरत होती है। मिट्टी के कटाव और खादों के कम उपयोग से जमीन कमजोर हो जाती है। ​

जैविक और रासायनिक का संतुलन: अच्छी पैदावार और मिट्टी की सेहत बनाए रखने के लिए रासायनिक खादों के साथ-साथ जैविक खादों का इस्तेमाल बेहद जरूरी है। जैविक खादों की मात्रा: प्रति हेक्टेयर 5 से 10 टन अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद, 5-8 टन कम्पोस्ट या 3-6 टन वर्मीकम्पोस्ट का उपयोग करना चाहिए। इसके अलावा ढैंचा या ग्वार जैसी हरी खाद भी जमीन को ताकत देती है।

​जैविक खाद के फायदे: इससे मिट्टी भुरभुरी होती है, जड़ों का विकास तेजी से होता है और मिट्टी की जलधारण क्षमता (Water holding capacity) बढ़ती है, जिससे सिंचाई के पानी की बचत होती है। फसल की गुणवत्ता सुधरने से बाजार में भाव भी अच्छे मिलते हैं।

​पानी की एक-एक बूंद कीमती है। इसलिए सिंचाई के पुराने तरीकों को छोड़कर नई तकनीकें अपनाना समय की मांग है: ​ड्रिप और स्प्रिंकलर सिस्टम: फव्वारा (Sprinkler) और बूंद-बूंद (Drip) सिंचाई प्रणालियां कम पानी में ज्यादा रकबे को सींचने का सबसे बेहतरीन विकल्प हैं। उबड़-खाबड़ या रेतीली जमीनों के लिए यह वरदान हैं।

​सरकारी योजनाओं का लाभ: ड्रिप सिस्टम लगाने का शुरुआती खर्च थोड़ा ज्यादा हो सकता है, लेकिन केंद्र और राज्य सरकारें इसके लिए भारी सब्सिडी और ऋण सुविधाएँ देती हैं। किसानों को इसका पूरा फायदा उठाना चाहिए।​ क्रांतिक अवस्थाओं पर सिंचाई: पानी कम होने पर फसल की सबसे नाजुक अवस्थाओं में ही सिंचाई करें। उदाहरण के लिए, यदि गेहूं में केवल एक पानी उपलब्ध है, तो उसे ‘क्राउन रूट’ (CRI) यानी जड़ें बनते समय दें। दो पानी उपलब्ध हों, तो दूसरा पानी फूल आते समय दें।

​खरपतवार (कचरा/नींदा) न केवल मुख्य फसल की जगह घेरते हैं, बल्कि जमीन से बहुमूल्य पानी और पोषक तत्व भी खींच लेते हैं।

पलवार तकनीकें का प्रयोग

​मल्चिंग (आवरण) तकनीकें: बुवाई के बाद खेत में फसल के पुराने अवशेषों (पराली आदि) की परत बिछा दें। इससे खरपतवार के बीज नहीं उग पाते और सूरज की गर्मी से मिट्टी की नमी भी नहीं उड़ती। ​निराई-गुड़ाई: बुवाई के 20 से 40 दिन बाद खेत में निराई-गुड़ाई (Hoeing) जरूर करें। इससे न सिर्फ खरपतवार खत्म होते हैं, बल्कि जमीन की ऊपरी परत टूट जाती है, जिससे मिट्टी की नमी भाप बनकर नहीं उड़ पाती और जड़ों को अच्छी हवा मिलती है। ​शाकनाशियों का प्रयोग: जरूरत पड़ने पर कृषि विशेषज्ञों की सलाह से उचित समय पर सही खरपतवारनाशक दवाइयों का छिड़काव किया जा सकता है।

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