सफेद लट का मानसून के साथ जीवन चक्र आरम्भ होता है। अंग्रेजी के ‘C’ अक्षर की तरह गोलाई में मुड़ी हुई सफेद मोटी इल्ली जिसका सिर गहरे भूरे रंग का होता है। खरीफ की फसलों में मुख्यतः हल्की बालू मिट्टी वाले क्षेत्रों में सफेद लट सबसे बड़ी दुश्मन है। इस कीट की प्रौढ़ (भृंग) व लट दोनों ही अवस्थाएँ नुकसान पहुँचाती हैं। लट अवस्था जमीन में रहकर जीवित पौधों की जड़ों को खाती है, जबकि प्रौढ़ अवस्था पेड़ों की पत्तियों को खाती हैं। छोटी-छोटी लटें अण्डों से निकलते ही पौधों की जड़ों को खाना शुरू कर देती हैं जिससे पौधा पीला पड़ जाता है, बढ़वार रुक जाती है एवं अंत में पौधा मर जाता है और खेतों में कई जगह खाली घेरे बन जाते हैं। लटों की तरह इनके भृंग भी सर्वहारी होते हैं तथा ये अनेक पेड़ों की पत्तियों को खाकर नुकसान पहुँचाते हैं। कीट द्वारा फसलों में लट एवं पेड़-पौधों में भृंग द्वारा नुकसान होता है। विभिन्न फसलों व फल वृक्षों में इसके द्वारा क्षति सीमा को देखते हुए इस कीट को राष्ट्रीय कीट की संज्ञा दी जा चुकी है। यह कीट सर्वभक्षी प्रवृत्ति का होता है, फिर भी यह विशेषकर ज्वार, बाजरा, गन्ना, मूंगफली, अरहर, राजमा, मिर्च, बैंगन व भिंडी को क्षति पहुँचाती है।
राजस्थान के हल्के बालू मिट्टी वाले क्षेत्रों में होलोट्राईकिया कन्सेनगिनिया (Holotrichia consanguinea) प्रजाति भृंगों की सफेद लट एक साल में एक पीढ़ी पूर्ण करती है। मानसून अथवा मानसून पूर्व की पहली अच्छी वर्षा के पश्चात इस कीट के भृंग सायं काल गोधुली वेला (लगभग सायं 7:30 बजे से 7:45 बजे के बीच) के समय प्रतिदिन भूमि से बाहर निकलते हैं। दिन में सूर्य के तीव्र प्रकाश में यह भृंग भूमि से बाहर नहीं निकलते हैं। जब सूर्य के डूबने का समय हो रहा होता है तब ये भृंग जमीन से बाहर निकलकर आस-पास के पोषि वृक्षों पर बैठते हैं।भृंगों के पोषि वृक्ष खेजड़ी, नीम, बेर, गुलर, सेंजना, गुलमोहर आदि हैं। यह भृंग मानसून अथवा मानसून पूर्व की पहली अच्छी वर्षा के पश्चात इस कीट के भृंग सायं काल गोधुली वेला (लगभग सायं 7:30 बजे से 7:45 बजे के बीच) के समय भूमि से बाहर निकलना प्रारम्भ करते हैं। पहले मादा भृंग जमीन से निकलकर वृक्षों पर बैठती है तथा अपने शरीर से एक विशेष प्रकार का रसायन (फेरोमोन) वायु में विसर्जित करती है। नर भृंग भूमि से बाहर निकलकर इस रसायन से आकर्षित होकर वृक्षों पर बैठी मादा भृंगों की ओर जाते हैं। यह रसायन उन्हीं मादा भृंगों द्वारा छोड़ा जाता है जो समागम करना चाहती हैं।समागम के पश्चात भृंग यदि पोषि वृक्षों पर नहीं होते हैं तो पोषि वृक्षों पर चले जाते हैं तथा पत्तियां खाना प्रारम्भ कर देते हैं। भृंग रात भर वृक्षों पर रहते हैं तथा प्रातः सूर्योदय से पहले पुनः भूमि में चले जाते हैं और अगले दिन सायंकाल फिर निश्चित समय (गोधुली वेला) पर भूमि से निकलकर वृक्षों पर जाते हैं। यह क्रम लगभग 4-5 सप्ताह अथवा 28-35 दिन तक चलता है।मादा भृंग समागम के 3-4 दिन पश्चात गीली मिट्टी में लगभग 8-10 से.मी. गहराई पर अण्डे देना शुरू कर देती है परन्तु यह सारे अण्डे एक साथ न देकर किस्तों में 4-5 सप्ताह अर्थात् लगभग 1 महीने तक अण्डे देती रहती है। इसके पश्चात अण्डों से 7-13 दिन बाद लट निकलती हैं। सफेद लट की तीन अवस्थाएँ होती हैं जिनकी कुल अवस्था 12-16 सप्ताह की होती है।
सफेद लट की प्रथम अवस्था 2-3 सप्ताह तक रहती है, यह लटें पौधों की सूक्ष्म जड़ों को खाती हैं।द्वितीय अवस्था 4-5 सप्ताह की होती है।तृतीय अवस्था 6-8 सप्ताह की होती है।द्वितीय व तृतीय अवस्था पौधे की बड़ी जड़ों को काटती हैं और यह जुलाई से मध्य अक्टूबर तक पौधे की जड़ों को खाती रहती है। इसके पश्चात यह लटें भूमि में गहराई में चली जाती हैं और करीब 40-70 से.मी. गहराई पर ये लट कृमिकोष (Pupa) अवस्था में बदलती हैं जिसका रंग क्रीमी सफेद होता है। अब कृमिकोष लगभग 2 सप्ताह बाद प्रौढ़ अवस्था में बदलता है जिसका रंग तांबे जैसा चमकदार होता है, जो अगली वर्षा आने तक भूमि की गहराई में 70-100 से.मी. गहराई तक चले जाते हैं।इस समय यह भृंग निष्क्रिय होकर भूमि में पड़े रहते हैं और इनके जननांग अपरिपक्व होते हैं। इन भृंगों के जननांग मई माह के अन्त तक परिपक्व होते हैं और इस समय मानसून पूर्व वाली भारी वर्षा के बाद भूमि से बाहर निकल कर अपना अगला जीवन चक्र आरम्भ कर देते हैं। इस प्रकार इस विनाशकारी कीट के प्रकोप से खरीफ की फसलों की सुरक्षा दो ही परिस्थितियों में की जा सकती है:पहली जब यह कीट वयस्क अवस्था में हो।दूसरी जब सूंडी (लट) की प्रथम अवस्था हो।
प्रौढ़ कीट (भृंग) का नियंत्रण:
* सफेद लट के परपोषी वृक्षों का चुनाव आस-पास के वृक्षों के समूह में से करें जैसे—नीम, बेर, खेजड़ी, अमरूद एवं गुलर इत्यादि।
*जहाँ भृंगों को परपोषी वृक्षों से रात में पकड़ने की सुविधा हो, उन जगहों पर भृंग एकत्रित कर 5 प्रतिशत केरोसिन मिले पानी में डालकर नष्ट करें।भृंग प्रकाश के प्रति आकर्षित होते हैं। अतः इन्हें प्रकाशपाश (Light Trap) पर आकर्षित कर, एकत्रित कर मिट्टी के तेल मिले पानी में डालकर नष्ट करें।
*परपोषी वृक्षों में चिन्हित वृक्षों पर फेरोमोन (मीथोक्सी बेन्जीन) शाम के समय लगावें। भृंग 15-20 मीटर की दूरी से फेरोमोन की तरफ आकर्षित होते हैं। अतः प्रति हैक्टर 3-4 परपोषी वृक्षों पर ही फेरोमोन लगावें व उन्हीं पर कीटनाशी रसायनों का छिड़काव करें।मानसून की शुरुआत के साथ ही भृंग खेतों के आस-पास खड़े खेजड़ी, बेर, नीम, अमरूद एवं आम आदि पेड़ों पर इकट्ठे होते हैं। इसलिए इन पेड़ों पर
*मानसून की शुरुआत होते ही दिन के समय इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एस.एल. 1.5 मिली. प्रति लीटर या क्यूनालफॉस 25 ई.सी. 2 मिली. पानी में मिलाकर छिड़काव करें।
सफेद लट अवस्था में नियंत्रण :
खरीफ की विभिन्न सिंचित व असिंचित फसलों व बुवाई के समयानुसार लट नियंत्रण के उपाय अलग-अलग होते हैं। वर्षा के साथ बोई जाने वाली फसलों में लट नियंत्रण:- बीज उपचार: मूंगफली की फसल में सफेद लट की रोकथाम हेतु क्लोथियानिडिन डब्ल्यू.डी.जी. 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज (गुली) को बीजोपचार करें या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एस.एल. 3 मिली. प्रति किलो बीज के हिसाब से मिलाकर (उपचारित बीज को 2 घण्टे छाया में सुखाकर बुवाई करनी चाहिए) बुवाई करें। बाजरे के एक किलो बीज में 3 ग्राम कार्बोफ्यूरान 3 प्रतिशत या क्यूनालफॉस 5 प्रतिशत कण मिलाकर बुवाई करें।
भूमि उपचार:
सफेद लट से प्रभावित क्षेत्रों में क्यूनालफॉस 5 प्रतिशत कण 25 किलो प्रति हैक्टर बुवाई से पूर्व हल द्वारा कतारों में ऊर देवें तथा इन्हीं कतारों पर बुवाई करें। अग्रिम बोई गई फसल में उपचार: सफेद लट नियंत्रण हेतु 4 लीटर क्लोरपायरीफॉस 20 प्रतिशत ई.सी. या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एस.एल., 300 मि.ली. प्रति हैक्टर 100 किलो बजरी में मिलाकर फसल में भुरकाव कर पानी पिलायें। यह उपचार मानसून की वर्षा के 21 दिन बाद भृंगों की संख्या के आधार पर करें।