इसबगोल की खेती

आईये जानें digital FPO से इसबगोल की खेती के मुख्य वैज्ञानिक तकनीकें

इसबगोल की खेती में किसानों को घटिया किस्म और बहुत महंगे बीजों पर भरोसा नहीं करना चाहिए क्योंकि खेती में कृषि अनुसंधान संस्थाओं के उच्च गुणवत्ता और कम कीमत पर उपलब्ध है जो जलवायु अनुकुल और रोग रोधी  किस्में शानदार पैदावार देती है

इसबगोल की खेती किसानो की एक बेहद महत्वपूर्ण और मुनाफे वाली औषधीय नकदी फसल है। भारत दुनिया भर में इसबगोल का सबसे बड़ा उत्पादक और निर्यातक है। इसकी भूसी का उपयोग मुख्य रूप से कब्ज, पेट के रोगों और आयुर्वेदिक व एलोपैथिक दवाइयों में किया जाता है। यदि किसान वैज्ञानिक और आधुनिक तरीके से इसकी खेती करें, तो वे कम लागत में बेहतरीन मुनाफा कमा सकते हैं।इसमे मौसम का प्रभाव ज्यादा होने के कारण खेती में लाभ के साथ नुकसान भी बहुत हो सकता हैं किसान जागरूकता और मौसम को ध्यान में रख इसबगोल की खेती को लाभदायक बनाने की खास तकनिकें

1. भूमि सुधार, मिटटी परीक्षण और उपचार

2. इसबगोल की मुख्य किस्में

3. इसबगोल की बुवाई पोषक तत्व प्रबन्धन

4 .इसबगोल की सिंचाई

5.इसबगोल के रोग और खरपतवार नियंत्रण

6. इसबगोल को पकने और कटाई का प्रबंधन

7. इसबगोल का खलियान और थ्रेशिंग

8. इसबगोल का भण्डारण और मार्केटिंग

​इसबगोल की खेती के लिए अच्छे जल निकास वाली बलुई दोमट या हल्की दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है। भारी मिट्टी में इसकी खेती सफल नहीं होती।​

मिट्टी परीक्षण (Soil Testing): बुवाई से पहले खेत की मिट्टी की जांच जरूर करवाएं। इससे खेत में मौजूद पोषक तत्वों की सही जानकारी मिलती है।​

भूमि सुधार: खेत की पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करें। इसके बाद 2-3 बार कल्टीवेटर या देसी हल से जुताई करके पाटा लगा दें ताकि मिट्टी भुरभुरी हो जाए और खेत समतल हो जाए। दीमक और अन्य कीटों से बचाव के लिए खेत में नीम की खली या अनुशंसित कीटनाशक का प्रयोग करें।

इसबगोल की खेती में अच्छी पैदावार के लिए प्रमाणित और उन्नत किस्मों के बीजों का ही चयन करना चाहिए। भारत में इसबगोल की कुछ प्रमुख और अधिक पैदावार देने वाली किस्में इस प्रकार हैं:​

कृषि अनुसंधान केन्द्र द्वारा इसबगोल  अच्छी किस्म RI - 1  द्वारा भरपूर उत्पादन एवं अच्छा बाजार भाव प्राप्त करना ही किसान को समृद्ध बना सकती है

गुजरात इसबगोल-1 (GI-1) और गुजरात इसबगोल-2 (GI-2): ये किस्में रोगों के प्रति अधिक सहनशील हैं और इनकी पैदावार काफी अच्छी होती है।

​निहारिका: यह किस्म लगभग 120-130 दिनों में पककर तैयार हो जाती है।​हरियाणा इसबगोल-5: यह किस्म भी भारतीय जलवायु के लिए बहुत अनुकूल मानी जाती है। (नोट: हमेशा अपने कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) से सलाह लेकर अपने क्षेत्र की जलवायु के अनुसार किस्म का चुनाव करें।)

बुवाई का समय: इसबगोल की बुवाई का सबसे सही समय अक्टूबर के अंतिम सप्ताह से लेकर नवंबर के मध्य तक होता है।​

बीज की मात्रा: एक हेक्टेयर खेत के लिए लगभग 4 से 5 किलोग्राम बीज पर्याप्त होता है। बुवाई से पहले बीजों को फफूंदनाशक (जैसे थाइरम या कैप्टान) से उपचारित जरूर करें।

​पोषक तत्व (उर्वरक): मिट्टी परीक्षण रिपोर्ट के आधार पर खाद दें। सामान्य तौर पर खेत तैयार करते समय 10-15 टन सड़ी हुई गोबर की खाद मिलाएं। इसके अलावा 25 किलो नाइट्रोजन, 25 किलो फास्फोरस और 30 किलो पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई के समय दें। नाइट्रोजन की आधी मात्रा बुवाई के 30-40 दिन बाद टॉप ड्रेसिंग के रूप में दें।​

​इसबगोल एक ऐसी फसल है जिसे बहुत अधिक पानी की आवश्यकता नहीं होती है।​

इसबगोल की खेती में सिंचाई का विशेष महत्व है यदि पानी क्षारीय और कठोर है तो सुखे खेत में बीज बुआई के बाद दो से तीन घण्टा भरपूर पानी एक बार देना है ताकि सम्पूर्ण बीज अंकुरित होकर पौधा बन जाये अन्यथा थोड़ा- थोड़ा पानी दो तीन बार अंकुरण के लिए दिया तो कठोर पानी से अंकुरित पौधा जलकर नष्ट हो जायेगा और फसल पर प्रतिकुल प्रभाव पड़ता है

पहली सिंचाई: बुवाई के तुरंत बाद हल्की सिंचाई करनी चाहिए। यदि सिंचाई का पानी कठोर या क्षारीय है तो प्रथम सिंचाई एक बार ही करे यदि दो या तीन दिन बाद हल्की सिंचाई कठोर पानी से करते है तो अंकुरित बीज या ऊगा हुआ पौधा जलकर खत्म हो जायेगा अतः कठोर पानी से प्रथम सिंचाई फँव्वारें से कम से कम दो घण्टा चलाये ।

​दूसरी और तीसरी सिंचाई: बीज अंकुरण के बाद लगभग 30-40 दिन के अंतराल पर सिंचाई करें।​ध्यान रहे, फसल पकने के समय (बालियां निकलने के बाद) तेज बारिश या अधिक पानी फसल को नुकसान पहुंचा सकता है, जिससे बीज झड़ने की समस्या हो सकती है।​

बुवाई के 20 से 25 दिन बाद पहली निराई-गुड़ाई करें। जरूरत पड़ने पर दूसरी निराई-गुड़ाई 40-45 दिन बाद की जा सकती है। इससे पौधे का विकास तेजी से होता है।​

रोग प्रबंधन: इसबगोल में मुख्य रूप से डाउनी मिल्ड्यू (मृदुरोमिल आसिता) या ‘तुलासिता’ रोग लगने का खतरा रहता है। इसमें पत्तियों पर सफेद धब्बे पड़ जाते हैं। इसकी रोकथाम के लिए कृषि विशेषज्ञों की सलाह से मेंकोजेब (Mancozeb) या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड का छिड़काव करें।​

​इसबगोल की फसल लगभग 115 से 130 दिनों में पककर तैयार हो जाती है।

इसबगोल की खेती का मुख्य कार्य फसल की बालियाँ पीली होने पर हथेली में लेकर रगड़ने से दाने टुटे नही तो कटाई शुरू करके जितना जल्दी हो सके एकत्र करना चाहिए

​पकने की पहचान: जब पौधे की पत्तियां पीली पड़ने लगें और बालियों (Spikes) का रंग हल्का लाल या भूरा होने लगे, तो समझ लें कि फसल कटाई के लिए तैयार है।

​कटाई: बीजों को झड़ने से बचाने के लिए कटाई हमेशा सुबह औस हटने के बाद करनी चाहिए घूप लगने पर कम बिखरती है । पौधों को दरांती की मदद से जमीन ऊपर से केवल बालिया काटना चाहिए।​

काटी गई फसल को बंडलों में बांधकर इकट्ठा किया गया है तो बंडलों को खोलकर साफ खलियान (Threshing Floor) पर धूप में 2-3 दिन तक सुखने के बाद पुरी फसल को पलटकर नीचे वाली ऊपर करके अच्छी तरह सुखाएं। ​पूरी तरह सूखने के बाद, फसल की गहाई (Threshing) ट्रैक्टर चलाकर या डंडों से पीटकर की जा सकती है। इसके बाद बीजों को सूप (छाज) या पंखे की मदद से भूसे से अलग कर लें।

​8. सुरक्षित भण्डारण और मार्केटिंग​भण्डारण (Storage):

इसबगोल के बीजों को नमी से बचाना बहुत जरूरी है। बीजों को पूरी तरह सुखाने के बाद साफ जूट के बोरों में भरकर किसी सूखे, हवादार और नमी-मुक्त कमरे में जमीन से थोड़ा ऊपर (लकड़ी के पट्टों पर) स्टोर करें।​

मार्केटिंग: इसबगोल की बाजार में भारी मांग है। किसान इसे सीधे अपने नजदीकी किसान उत्पादक संगठन(FPO) या कृषि उपज मंडी समिति में व्यापारियों को बेच सकते हैं। इसके अलावा, ई-नाम (E-nam) पोर्टल क्लिक करे और कई बड़ी फार्मास्युटिकल (दवा बनाने वाली) कंपनियां और आयुर्वेदिक संस्थान कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के जरिए भी किसानों से सीधा इसबगोल खरीदते हैं, जिससे बेहतर दाम मिलता है।​

निष्कर्ष​

इसबगोल की खेती कम लागत और कम सिंचाई में अधिक मुनाफा देने वाला एक बेहतरीन विकल्प है। यदि किसान सही समय पर बुवाई, उन्नत किस्मों का चयन और उचित रोग प्रबंधन (विशेषकर फसल पकते समय बेमौसम बारिश से बचाव) का ध्यान रखें, तो इसकी खेती से बंपर पैदावार और शानदार आमदनी प्राप्त की जा सकती है।

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