सरसों की खेती

आइये जाने digital FPO से “ सरसों की खेती” की महत्वपूर्ण तकनीकें

सरसों की खेती में आधुनिक तकनीकों और परम्परा गत तकनीकों के समन्वय से कम खर्च में ज्यादा उत्पादन बढ़ाया जा सकता है सरसों तिलहनी नगदी फसल है किसानों की आय और देश को तिलहन में आत्मनिर्भर बनाती है
सरसों की खेती में उन्नत तकनीकें

सरसों की खेती: बुवाई से लेकर मार्केटिंग तक की सम्पूर्ण जानकारी
​सरसों की खेती का राजस्थान की कृषि अर्थव्यवस्था में विशेष महत्व है, और इसमें भी ‘सरसों’ (Mustard) किसानों के लिए एक प्रमुख नकदी फसल (Cash Crop) है। कम पानी, सीमित संसाधन और बदलते मौसम के बीच सरसों की खेती राजस्थान के किसानों के लिए वरदान साबित होती है।


सरसों की खेती को पारंपरिक खेती के बजाय यदि हम वैज्ञानिक तरीकों, मिट्टी परीक्षण, सही खाद प्रबंधन और उन्नत मार्केटिंग का उपयोग करें, तो पैदावार और मुनाफा दोनों को कई गुना बढ़ाया जा सकता है।
​इस विस्तृत लेख में हम” सरसों की खेती “ के हर एक पहलू पर बारीकी से चर्चा करेंगे—भूमि सुधार से लेकर, वेस्ट डीकम्पोजर के उपयोग, खरपतवार एवं ओराबंकी, सल्पफर और जिप्सम का उपयोग, पाले से बचाव और अंत में उपज की सही मार्केटिंग तक।


​1. सरसों की खेत के लिए भूमि का चुनाव और गहरी जुताई (Land Selection & Preparation)
​सरसों की खेती के लिए अच्छे जल निकास वाली बलुई दोमट (Sandy Loam) या दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है।
​खेत की तैयारी: खरीफ की फसल कटने के बाद खेत की पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल (MB Plough) से गहरी करनी चाहिए। इससे हानिकारक कीटों के अंडे और खरपतवार के बीज तेज धूप में नष्ट हो जाते हैं।

सरसों की खेती में खरीफ फसल करते ही भूमि सुधार और मिट्टी परीक्षण कर आवश्यक पोषक तत्व प्रबन्धन करना अति आवश्यक है


​नमी संरक्षण: इसके बाद कल्टीवेटर से दो-तीन बार आड़ी-तिरछी जुताई करके पाटा (Planker) लगा देना चाहिए ताकि मिट्टी भुरभुरी हो जाए और नमी सुरक्षित रहे। बीज के अच्छे उगाव के लिए खेत में पर्याप्त नमी का होना पहली शर्त है।

​2. मिट्टी परीक्षण: यहां क्लिक करें

सरसों की खेती में सफल खेती की नींव (Soil Testing)
​अक्सर किसान बिना जांच के ही यूरिया और डीएपी (DAP) का अंधाधुंध प्रयोग करते हैं। सरसों की बम्पर पैदावार के लिए मिट्टी परीक्षण (Soil Testing) बेहद जरूरी है।
​पोषक तत्वों की जानकारी: परीक्षण से यह स्पष्ट हो जाता है कि खेत में मुख्य पोषक तत्व (नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश) और सूक्ष्म तत्व (Micro-nutrients जैसे जिंक, लोहा, बोरॉन) कितनी मात्रा में उपलब्ध हैं।
​मिट्टी का pH और सुधार: यदि परीक्षण में मिट्टी का pH मान अधिक (क्षारीय) आता है, तो भूमि सुधार के लिए बुवाई से लगभग एक महीने पहले खेत में जिप्सम (Gypsum) डालना चाहिए। यह न केवल मिट्टी को सुधारता है बल्कि सरसों के लिए एक बेहतरीन खाद का काम भी करता है।


​3. सरसों की खेती में जैविक खाद प्रबंधन: वेस्ट डीकम्पोजर (Waste Decomposer) का जादू
​खेत में कच्चा गोबर डालने से दीमक (Termites) और फफूंद जनित रोगों का भारी खतरा रहता है।
​सड़ाने की वैज्ञानिक विधि: गोबर की खाद को सड़ाने के लिए ‘वेस्ट डीकम्पोजर’ (Waste Decomposer) का इस्तेमाल करें। 200 लीटर पानी में 2 किलो गुड़ और एक शीशी वेस्ट डीकम्पोजर मिलाकर घोल तैयार करें। इस घोल को गोबर के ढेर पर छिड़क कर उसे सड़ाएं।


​फायदे: मात्र 30 से 40 दिन में यह खाद चायपत्ती जैसी भुरभुरी और काले रंग की उत्तम जैविक खाद में बदल जाती है। खेत की तैयारी के समय इसे मिट्टी में मिलाने से कार्बनिक तत्वों (Organic Carbon) में भारी वृद्धि होती है और मिट्टी की जल धारण क्षमता बढ़ जाती है।


​4. आवश्यक पोषक तत्व: जिप्सम और सल्फर का चमत्कार
​सरसों एक तिलहनी फसल है, इसलिए इसके लिए गंधक (सल्फर) और जिप्सम किसी चमत्कार से कम नहीं है।
​जिप्सम का प्रयोग: बुवाई से पहले खेत तैयार करते समय 250 किलोग्राम जिप्सम प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में मिलाना चाहिए। जिप्सम में कैल्शियम और सल्फर दोनों होते हैं।

जिप्सम यहां विलक करें

जिप्सम को दो चरणों में सीधे खेत में देना सबसे वैज्ञानिक और सुरक्षित तरीका है:
​पहला चरण (बुवाई के समय बेस डोज़):

खेत की आखिरी जुताई के समय जिप्सम की आधी मात्रा मिट्टी में मिला दें। यह मिट्टी की मूल क्षारीयता को खत्म करेगा और बीज के बेहतरीन उगाव (Germination) के लिए जमीन तैयार करेगा।


​दूसरा चरण (पौधे की 2 फीट ऊंचाई पर टॉप ड्रेसिंग): जब सरसों का पौधा लगभग 2 फीट का हो जाए (फूल आने और शाखाएं निकलने की शुरुआत का समय), तब बाकी बचे जिप्सम का खड़ी फसल में भुरकाव (Broadcasting) कर दें और उसके बाद स्प्रिंकलर से सिंचाई करें।
​2 फीट की ऊंचाई पर जिप्सम भुरकाव के वैज्ञानिक फायदे:


​पानी का तुरंत उपचार: जब स्प्रिंकलर का क्षारीय पानी जमीन पर पड़े ताजे जिप्सम पर गिरता है, तो पानी का खारापन वहीं कट जाता है। इससे जड़ों को एकदम सही pH वाला पानी मिलता है।
​सल्फर की सही समय पर आपूर्ति: पौधे की 2 फीट की ऊंचाई वह समय है जब सरसों को फलियां बनाने और दानों में तेल भरने के लिए सबसे ज्यादा गंधक (सल्फर) की जरूरत होती है। इस समय दिया गया जिप्सम दानों का वजन और तेल की मात्रा सीधे तौर पर बढ़ाता है।

​सल्फर के फायदे: सल्फर (Sulphur) के उपयोग से सरसों के दानों का आकार बड़ा होता है, वजन बढ़ता है, चमक आती है और सबसे महत्वपूर्ण—दानों में तेल की मात्रा (Oil Content) 2% से 4% तक बढ़ जाती है। तेल की मात्रा अधिक होने पर मंडी में व्यापारी इस सरसों का भाव हमेशा सामान्य से ज्यादा लगाते हैं।
सरसों की फसल में बंपर पैदावार और दानों में तेल की भरपूर मात्रा के लिए दानेदार (Granular) और घुलनशील (WDG), दोनों तरह के सल्फर का अपना-अपना वैज्ञानिक महत्व है।


दानेदार सल्फर (Bentonite Sulphur 90%) का उपयोग
​यह सल्फर छोटे दानों के रूप में आता है। इसमें 90% सल्फर और 10% बेंटोनाइट क्ले (मिट्टी) होती है, जो नमी सोखकर फूलती है और सल्फर को धीरे-धीरे मिट्टी में रिलीज करती है।
​प्रयोग का सही समय: बुवाई से ठीक पहले खेत की आखिरी जुताई के समय (बेसल डोज़ के रूप में) मिट्टी में मिलाना सबसे बेहतरीन रहता है। यदि बुवाई के समय चूक गए हैं, तो पहली सिंचाई (25-30 दिन की अवस्था) पर यूरिया के साथ मिलाकर इसका भुरकाव कर सकते हैं।


​मात्रा: 10 से 15 किलोग्राम प्रति एकड़।
​तकनीक: इसे अन्य खादों के साथ मिलाकर सीधे खेत की मिट्टी में भुरकाव (Broadcasting) विधि से दें।
​मुख्य फायदे: यह धीरे-धीरे घुलता है (Slow Release), जिससे फसल को कटाई तक लगातार सल्फर मिलता रहता है। यह क्षारीय जमीन का pH सुधारकर जड़ों के लिए अनुकूल वातावरण बनाता है और दानों में तेल की मात्रा 2-4% तक बढ़ा देता है।


​घुलनशील सल्फर (Sulphur 80% WDG) का उपयोग
​यह बारीक पाउडर के रूप में आता है और पानी के संपर्क में आते ही तुरंत घुल जाता है। यह फसल में सल्फर की तुरंत कमी दूर करने के साथ-साथ एक बेहतरीन फफूंदनाशक (Fungicide) का काम भी करता है।
​प्रयोग का सही समय: फसल जब 40-45 दिन की हो (फूल निकलने से ठीक पहले) या जब सर्दियों में पाला (Frost) पड़ने की चेतावनी हो।


​मात्रा: 2 से 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी।
​तकनीक: इसे पानी में घोलकर सीधे पत्तों पर छिड़काव (Foliar Spray) करें। स्प्रिंकलर (फव्वारा) सिस्टम से भी इसे सिंचाई के पानी के साथ दिया जा सकता है, लेकिन बैटरी या ट्रैक्टर चलित स्प्रे मशीन से सीधे पत्तों पर छिड़काव करना ज्यादा असरदार रहता है।


​मुख्य फायदे: यह पत्तों के माध्यम से तुरंत अवशोषित (Instant Absorption) होता है। इसके छिड़काव से फसल के ऊपर एक सूक्ष्म आवरण बन जाता है, जो पाले से बचाव करता है और सरसों में लगने वाले छाछ्या (Powdery Mildew) रोग को खत्म करता है।


​5. बीज उपचार और जड़ की फफूंद से बचाव (Seed Treatment & Root Fungi)
​राजस्थान में सरसों की फसल में जड़ गलन (Root rot) और तना गलन (Sclerotinia stem rot) की समस्या काफी देखी जाती है। यह फफूंद जड़ में उगकर पौधे के जाइलम को ब्लॉक कर देती है, जिससे हरा-भरा पौधा अचानक सूख जाता है।


​बीज उपचार (Seed Treatment): बुवाई से पहले बीज को फफूंदनाशक से उपचारित करना अनिवार्य है। जैविक तरीके से 5-10 ग्राम ट्राइकोडर्मा विरिडी (Trichoderma viride) प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचार करें। रासायनिक उपचार के लिए कार्बेन्डाजिम या मेन्कोजेब का इस्तेमाल किया जा सकता है।
​खड़ी फसल में उपचार: यदि खड़ी फसल में जड़ के पास सफेद रुई जैसी फफूंद दिखाई दे, तो तुरंत प्रमाणित फफूंदनाशी (Fungicide) की ड्रेन्चिंग (Drenching) जड़ों में करनी चाहिए।


​6. उत्तम उगाव और खरपतवार नियंत्रण (Germination & Weed Management)
​बुवाई का तरीका: हमेशा कतारों में (Line sowing) बुवाई करें। कतार से कतार की दूरी 30 सेमी और पौधे से पौधे की दूरी 10-15 सेमी रखें। बीज को 3 से 4 सेमी से ज्यादा गहरा न बोएं, अन्यथा उगाव (Germination) प्रभावित होगा।
​खरपतवार नियंत्रण: बुवाई के 25-30 दिन बाद, जब पहली सिंचाई का समय हो, तब खेत की निराई-गुड़ाई करनी चाहिए। इससे खरपतवार (Weeds) नष्ट हो जाते हैं और मिट्टी में हवा का संचार (Aeration) बढ़ता है, जिससे जड़ों का तेजी से विकास होता है।


ओरोबंकी (रुंखड़ी) की मुख्य पहचान
​यह सरसों की जड़ों पर उगने वाला एक पूर्ण जड़ परजीवी (Root parasitic weed) है, जिसकी अपनी कोई हरी पत्तियां नहीं होतीं।

सरसों की फसल की जड़ से 2 या 4  इंच दूर जमीन पर एक परजीवी पौधा उगता है जो सरसों की जड़ो से सरसों का पुरा पोषण ग्रहण कर वृद्धि करता है और सरसों का पौधा सुखकर खत्म हो जाता है समय रहते उखाड़ कर जलाना चाहिए


​यह सरसों के मुख्य तने से 2-4 इंच की दूरी पर मिट्टी से निकलता है और शुरुआती अवस्था में हल्के पीले, सफेद या भूरे-बैंगनी रंग के एक गुच्छे (हाथ या उंगलियों जैसी आकृति) के रूप में दिखाई देता है।
​यह सरसों की जड़ों से जुड़कर पौधे का सारा पानी और आवश्यक पोषक तत्व चूस लेता है, जिससे सरसों का पौधा कमजोर होकर सूखने लगता है और उपज भारी मात्रा में गिर जाती है।
​नियंत्रण और उपचार के उपाय


​भौतिक नियंत्रण: इसका सबसे सटीक इलाज यही है कि फूल आने और बीज बनने से पहले इसे जड़ सहित हाथ से उखाड़कर खेत से बाहर जला दें या गहरे गड्ढे में दबा दें। एक बार इसके बीज मिट्टी में गिर गए, तो वे 15-20 सालों तक नष्ट नहीं होते।
​फसल चक्र: जिस खेत में रुंखड़ी का भारी प्रकोप हो, वहां 2 से 3 साल तक सरसों की खेती न करें। इसकी जगह गेहूं, जौ या चना बोएं, क्योंकि यह फंगस या खरपतवार केवल सरसों परिवार के पौधों पर ही पनपती है।

​7. कीट प्रबंधन: लट और थ्रिप्स पर नियंत्रण (Pest Control: Caterpillars & Thrips)
​सरसों के शुरुआती विकास और फूल आने के समय कई रस चूसने वाले और पत्तियां खाने वाले कीट हमला करते हैं।
​लट (Caterpillar) और आरा मक्खी: ये पत्तों को किनारों से काटना शुरू करते हैं।
​थ्रिप्स (Thrips) और चेपा (Aphids): ये पत्तों और कोमल टहनियों का रस चूसते हैं।
​जैविक व पारंपरिक बचाव: शुरुआती अवस्था में सुबह के समय जब पत्तों पर ओस हो, तब राख (Ash) का भुरकाव (Dusting) करने से कीटों का प्रकोप कम हो जाता है। इसके अलावा नीम आधारित कीटनाशक (Neem oil – 1500 PPM) का स्प्रे भी बहुत कारगर है। भारी प्रकोप होने पर ही कृषि विशेषज्ञों की सलाह से रासायनिक पाउडर या स्प्रे का उपयोग करें।


​8. मौसम की मार: पाला से बचाव के अचूक उपाय (Protection from Frost)
​राजस्थान में दिसंबर और जनवरी के महीने में पाला (Frost) पड़ने की प्रबल संभावना रहती है। जब तापमान 0°C के करीब पहुंचता है, तो पौधों की कोशिकाओं के अंदर का पानी जम जाता है और कोशिकाएं फट जाती हैं, जिससे फसल पूरी तरह जल जाती है।


बचाव के तरीके:


​धुआं करना: जिस रात पाला पड़ने की आशंका हो (आसमान साफ हो और हवा रुक गई हो), उस रात खेत की उत्तर-पश्चिम दिशा में खेत के कचरे, घास-फूस से धुआं करें। धुआं एक आवरण बना लेता है जो जमीन की गर्मी को ऊपर जाने से रोकता है।
​हल्की सिंचाई: पाले की चेतावनी होने पर खेत में हल्की सिंचाई कर दें। इससे खेत का तापमान 1 से 2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाता है।


​थायोयूरिया (Thiourea) का स्प्रे: यह सबसे वैज्ञानिक और प्रभावी तरीका है। 500 पीपीएम (PPM) थायोयूरिया (50 ग्राम थायोयूरिया को 100 लीटर पानी में घोलकर) का छिड़काव फूल आने से पहले और फलियां बनते समय करें।
​व्यापारिक गंधक (Commercial Sulphur): पाले की संभावना होने पर 0.1% गंधक के तेजाब (Sulphuric Acid) का छिड़काव भी फसल को पाले से बचाता है।


​9. कटाई, खलिहान और थ्रेसिंग (Harvesting, Threshing Floor & Threshing)
​सही समय पर कटाई: फसल की कटाई तब करनी चाहिए जब 75% फलियां पीली पड़ जाएं और बीज कड़े होकर अपना प्राकृतिक रंग ले लें। बहुत ज्यादा सूखने पर फलियां चटकने लगती हैं जिससे बीज खेत में ही झड़ जाते हैं।
​खलिहान (Threshing Floor): कटी हुई फसल को खेत में छोड़ने के बजाय, साफ और पक्के खलिहान में लाकर सुखाना चाहिए। अगर खलिहान कच्चा है, तो उसे अच्छी तरह लीप-पोत कर तैयार करें ताकि फसल में मिट्टी न मिले।

सरसों की खेती में फळीयां पककर पीली होने लग जाये और फुल नहीं रहते है और फली को खोलकर देखने पर सभी दाने अपना रंग भूरा हो जाये और दाना का हरापन है तो कटाई जब तक रंग नहीं करनी है सम्पूर्ण फळीयों के दानों का रंग भूरा-लाल  हो जाये
अन्यथा पैदावार पर विपरित असर होता है अध पक्का दाना थ्रेसिंग में फुटकर चुरा बन कर चारा में चला जाता है औसतन उत्पादन पर असर पड़ता है
सरसों की तैयार फसल निरक्षण


​थ्रेसिंग (Threshing): फसल के अच्छी तरह सूख जाने (धूप लगने) के बाद थ्रेसिंग मशीन से दाने निकाल लें। मशीन की सेटिंग ऐसी रखें कि दाने टूटें नहीं, क्योंकि टूटे हुए दानों से तेल की क्वालिटी गिरती है और बाजार में भाव कम मिलता है।


​10. ग्रेडिंग और वैज्ञानिक भण्डारण (Grading & Scientific Storage)
​ग्रेडिंग (छनाई): थ्रेसिंग के बाद दानों को छलने से छानकर (Grading) बारीक दाने, डंठल और मिट्टी को अलग कर लेना चाहिए। एक समान और साफ दानों की बाजार कीमत हमेशा उच्च होती है।
​भण्डारण (Storage): भण्डारण करने से पहले बीजों को तेज धूप में सुखाना चाहिए। सुरक्षित भण्डारण के लिए दानों में नमी का स्तर 8 प्रतिशत से कम होना चाहिए। नमी ज्यादा होने पर भण्डारण के दौरान फफूंद (Fungus) लगने और कीटों के हमले का खतरा रहता है। बोरियों को हमेशा जमीन से थोड़ा ऊपर लकड़ी के तख्तों पर रखें और दीवारों से सटाकर न रखें।

11. मार्केटिंग और अतिरिक्त मुनाफा (Modern Marketing & FPC)
​किसानों की सबसे बड़ी चुनौती उत्पादन नहीं, बल्कि अपनी उपज का सही मूल्य प्राप्त करना है।
​सामूहिक बिक्री (Group Selling): उपज को मंडी के बिचौलियों (Middlemen) को औने-पौने दाम पर बेचने के बजाय, अपनी ‘फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी’ (FPC – Farmer Producer Company) के माध्यम से एक साथ इकट्ठा करें। जब एफपीसी के पास बड़ी मात्रा में उपज होती है, तो आप सीधे बड़ी तेल मिलों या कंपनियों से मोलभाव कर सकते हैं।
​ई-नाम (e-NAM): सरकार के राष्ट्रीय कृषि बाजार (e-NAM) पोर्टल पर पंजीकरण करके आप अपनी सरसों पूरे देश में कहीं भी बेच सकते हैं, जहां सबसे ज्यादा भाव मिल रहा हो।


​GI टैग और ब्रांडिंग: भविष्य में अपने क्षेत्र की विशिष्ट सरसों को एक ब्रांड बनाकर बेचना और उसकी गुणवत्ता के आधार पर बाजार में पहचान स्थापित करना एक लाभकारी कदम हो सकता है।

निष्कर्ष (Conclusion):
सरसों की खेती एक तकनीकी प्रक्रिया है। जमीन के अंदर बीज डालने से लेकर, बाजार में उपज बेचने तक हर कदम पर ज्ञान और सतर्कता की आवश्यकता होती है। यदि हम पुरानी पद्धतियों में थोड़ा सा वैज्ञानिक बदलाव लाएं—जैसे वेस्ट डीकम्पोजर का प्रयोग, सल्फर की पूर्ति, पाले से समय पर बचाव और स्मार्ट मार्केटिंग—तो सरसों की खेती वास्तव में एक अत्यधिक मुनाफे का व्यवसाय बन सकती है।

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